अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने के लिए नाम बदलने की राजनीती अपना रही है बीजेपी?

बीजेपी सरकारों द्वारा शहरों के नाम बदलने की राजनीति पर विपक्षी पार्टियों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार हमले हो रहे हैं, आरोप लगाए जा रहे हैं कि बीजेपीई सरकारें हर मोर्चे पर विफल रही हैं और इसीलिए जनता का धयान अपनी विफलताओं से हटाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।

ताज़े मामले में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने तंज़ कैसा है कि अगर नाम बदलने से देश सोने की चिड़िया बनता है तो सभी देशवासियों के नाम बदल देने चाहिए, पर सच्चाई यह है कि इससे देश में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। उन्होंने कहा कि अगर इस देश में सिर्फ शहरों के नाम बदलने से देश को सोने की चिड़िया बना सकते हैं, तो मैं मानता हूं कि 125 करोड़ हिन्दुस्तानियों का नाम राम रख देना चाहिए।।। इस देश में बेरोज़गारी, किसानों का प्रश्न बड़ा है, और ये नाम और मूर्तियों के चक्कर में पड़े हैं।।। उनका कहना है कि बीजेपी हमेशा चुनाव से पहले इस तरह के इमोशनल मुद्दे लाती है क्योंकि उनके पास अपने किये काम की फेहरिस्त नहीं होती है। यही कारण है कि कभी शहरों के नाम बदलती है और कभी राम मंदिर का मुद्दा लाती है। उन्होंने आगे कहा कि ‘हम तो 1993 से देखते आ रहे हैं कि बीजेपी के नेता हर चुनाव से पहले मंदिर की बात करते हैं। परन्तु वह अभी तक नीव तक नही रख पाए हैं, क्योंकि यह सिर्फ उनका चुनावी स्टन्ट हैं।’

प्रख्यात इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने बीजेपी सरकारों के नाम बदलने की राजनीती पर तंज़ करते हुए कहा कि पार्टी को सबसे पहले अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का सरनेम बदलना चाहिए। उनका कहना है कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का सरनेम ‘शाह’ दरअसल गुजराती नहीं है बल्कि फ़ारसी मूल का शब्द है, इसलिए बीजेपी को सबसे पहले अमित शाह का नाम बदलना चाहिए।

इससे पहले मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने पर दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट करते हुए लिखा था कि ‘अगर शहर का नाम बदलने की जगह सरकारी स्कूल-कॉलेजों के हालात बदलने पर थोड़ी मेहनत कर लेते तो आने वाली पीढ़ियों का भला हो जाता। पर नहीं… बच्चे अगर पढ़ लिख गए तो इनके नाम-धाम के झांसे में कैसे फंसेंगे…।’ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने ट्वीट को रीट्वीट करते हुए बीजेपी पर प्रहार किया था कि ‘बीजेपी को वोट दोगे तो शहरों और स्टेशनों के नाम बदलेंगे। AAP को वोट दोगे तो आपके बच्चों का भविष्य बदलेंगे।’

पिछले दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान का नाम बदलने के की ख़बरों के ऊपर भी अरविंद केजरीवाल ने कटाक्ष करते हुए कहा था कि ‘नाम बदलने से भारतीय जनता पार्टी को वोट नहीं मिलेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री का नाम बदलने से पार्टी को शायद कुछ वोट मिल जाएं।’
रामलीला मैदान इत्यादि के नाम बदलकर अटल जी के नाम पर रखने से वोट नहीं मिलेंगे

हालाँकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ नाम बदलने की राजनीति पर विपक्षी प्रहार के बावजूद पीछे हटने की जगह और भी आक्रामक रुख इख्तियार कर रहे हैं। उन्होंने शहरों के नाम बदलने के फैसले को सही बताते हुए कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो आगे भी उत्तर प्रदेश में कई और शहरों के नाम बदले जा सकते हैं । उन्होंने कहा कि उन्हें जो अच्छा लगा है उन्होंने वह किया है।

हालाँकि नाम बदलने की राजनीती पर बीजेपी सरकार के अंदर से विरोध के स्वर फूटे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने मुगलसराय स्टेशन, इलाहाबाद और फैजाबाद का नाम बदले जाने के योगी सरकार के फैसले का विरोध करते हुए कहा था कि यह ‘नाटक’ जनता को असल मुद्दों से भटकाने के लिए किया गया है। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने बीजेपी सरकार को शहरों का नाम बदलने से पहले अपने मुस्लिम नेताओं का नाम बदलने की नसीहत भी दी।

इससे पहले दिल्ली से सटे और उत्तरी भारत के सबसे बड़े सॉफ़्टवेयर और आईटी सेवा हब गुड़गांव का नाम गुरुग्राम करने पर भी भारी विरोध हुआ था। इस संपन्न इलाक़े के अमीर और कारोबारी तबके के मुताबिक़ नाम बदलने से गुड़गांव ब्रांड पर असर पड़ा है। ज्ञात रहे कि ग्लोबल कारोबार करने वाली कई कंपनियों के भारतीय दफ़्तर गुड़गांव में ही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का दावा किया जा रहा है कि केंद्र और विभिन्न राज्यों में बानी बीजेपी सरकारों ने अबतक १५० से भी ज़्यादा शहरों, सड़कों और गाँवों के नामों को बदल दिया है और इसी कड़ी में आगे भी यूपी, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे कई प्रदेशों के बड़े शहरों के नाम बदले जाने की योजना है।

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