कहानी : एक कप चाय

जब मैं सर के घर पहुँचा तो वे कुछ जल्दबाजी में थे और मोबाइल पर कैब बुक करवा रहे थे।
मुझसे उन्होंने कहा कि छोटी बहू की तबियत अचानक खराब हो गई है। और वे हॉस्पीटल जा रहे हैं। घर में कोई है नहीं। आप तीन चार-दिनों के बाद मिलिएगा।
मैंने कहा कि मैं भी चलता हूँ, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। कैब आ गया था। सर की पत्नी, जिन्हें हमलोग माँ जी कहते हैं और बड़ी बहू , छोटी बहू को सहारा देकर कैब में बैठा दिया। बड़ी बहू उसके साथ बैठ गई। उन्होंने कैब वाले से प्राइवेट नरसिंग होम में छलने लिए कहा। सर हमेशा उसी नर्सिंग
होम में घर के सदस्यों का इलाज करवाते हैं। यहाँ पास में जो सरकारी अस्पताल है उसके डॉक्टर ठीक से रीस्पांस नहीं करते। एक एम्स है, वहाँ इलाज अच्छा होता है, लेकिन वह यहाँ से बहुत दूर पड़ता है।

दूसरे दिन उनलोगों का हाल-चाल जानने के लिए मैं सर के घर गया। बरामदे का दरवाजा बंद था।
मैंने कॉलबेल दबाया।
‘‘कौन है?’’ अंदर से माँ जी की आवाज आई।
‘‘मैं हूँ।’’ मैंने कहा।
‘‘बरामदे में बैठिए। पूजा कर रही हूँ।’’ माँ जी ने कहा।
थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुला। माँ जी बाहर आईं।
‘‘सर और बडी बहू अस्पताल में हैं। सर के आने के बाद हालचाल मालूम होगा।’’ उन्होंने कहा। फिर वे अंदर चली गईं।
मैं बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठ गया। एक साइड में रबड़ से लिपटा हुआ पेपर रखा था। सर थे नहीं इसलिए किसी ने खोला नहीं था। मैं पेपर खोलकर पढ़ने लगा।
दिल्ली की हवा में प्रदूषण उच्चतम बिंदु पर। इन दिनों समाचार पत्र के हेडलाइन में यही रहता है।
आज का हेडलाइन भी यही था। लोगों को सांस लेना मुश्किल है। कैसे होगा इस समस्या का समाधान?
हमलोग सबेरे उठकर योगाभ्यास करते थे लेकिन अब वह भी करना मुश्किल हो गया है।
कुछ देर के बाद सर आए। वे बहुत हड़बड़ाए हुए थे। मैंने अभिवादन किया। मेरे अभिवादन का जवाब देकर वे सीधे अंदर चले गए।
फिर बाहर आकर उन्होंने कहा कि बड़ी बहू अस्पताल में है। इलाज चल रहा है। खाना खाकर उन्हें तुरंत अस्पताल जाना है। फिर बड़ी बहू आएगी। और वे फिर अंदर चले गए।
घर में कोई लड़का था नहीं। स्पष्ट था सभी खर्च सर ही कर रहे थे। बेटों से वे एक भी पैसा नहीं मांगते हैं। सिर्फ छोटी बहू ही नहीं, घर में किसी की भी तबियत खराब होती है, तो सर तुरंत उसका इलाज करवाते है। कोई एक पैसा नहीं देता है। सभी सोचते हैं, यह उनका काम है।
खाना खाने के बाद सर बाहर आए। मै और सर एक साथ निकले। सर अस्पताल चले गए और मैं घर आ गया।
तीन-चार दिनों के बाद मैं सर से मिलने उनके घर गया। छोटी बहू की तबियत ठीक हो गई थी।
बड़ी बहू के बच्चे बड़े हो गए हैं। वह स्कूल जा रहा है। सर उन्हें होमवर्क करवा रहे थे। मुझसे
उन्हांने बैठने के लिए कहा।
‘‘जरा इसे होमवर्क करवा देता हूँ।
‘‘जी बहुत अच्छा’’
‘‘ इससे मेरा भी मन लगा रहता है।’’
‘‘ हाँ सर।’’ मैंने कहा।

2

फिर एक दिन सर बच्चे को स्कूल से ला रहे थे।
’’इसके साथ थोड़ा मेरा घूमने-फिरने का भी काम हो जाता है। उन्होंने कहा
‘‘बहुत प्यारा बच्चा है।’’ मैंने कहा
‘‘यह हमेशा मेरे ही साथ रहता है।’’ सर ने कहा।
लेकिन सभी सोचते हैं यह सर का काम है।
मैं हिंदी ऑनर्स का छात्र हूँ। सर यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के प्रोफेसर से रिटायर हो चुके हैं। मैं ऑनर्स की तैयारी अच्छी तरह कर सकूँ इसके लिए उनसे मिलने बराबर जाता रहता हूँ।
आज जब मैं उनसे मिलने उनके घर गया तो वे बैठे हुए कंप्यूटर पर काम कर रहे थे। इन दिनों वे भाषा पर काम कर रहे हैं। अपनी भाषा शुद्ध रूप में आसान तरह से कैसे सभी को सिखाई जाए, सर इसके लिए रात-दिन व्यस्त रहते हैं। जो लोग हिंदी को एक जटिल भाषा समझते हैं, उन्हें जवाब देना सर
का उद्देश्य है, लेकिन सभी कह रहे हैं कि वे क्या दिन भर कंप्यूटर चलाते रहते हैं! एक भी पैसा तो आता नहीं है। इनसबों के बावजूद वे निर्बाध काम करते रहते हैं। सभी काम पैसों के लिए ही नहीं होता। ज़िन्दगी भर तो पैसे ही कमाते रहे। वे कहते हैं। यूनिवर्सिटी और क्लास के कारण कभी भाषा पर जमकर काम करने का समय मिला नहीं और अभी कर रहे हैं तो किसी को सुहाता नहींं है।
मुझे बैठने के लिए कहकर उन्होंने आवाज देकर छोटी बहू को एक कप चाय बनाकर लाने के लिए कहा।
हमलोग बातें करने लगे। सर के मन में था कि चाय आ रही है। वे इंतजार कर रहे थे।
बाहर बरामदे में पेपर आने की आवाज आई। पेपरवाले ने पेपर फेंक दिया था। हमलोग बातें करते रहे। लेकिन चाय नहीं आई।
वे इधर-उधर देखते हैं। फिर माँ जी को आवाज देकर बुलाते हैं।
माँ जी आई। वे उनसे कहते हैं कि छोटी बहू को उन्होंने चाय बनाने के लिए कहा था। लेकिन अबतक चाय नहीं आई।
माँ जी चाय नहीं पीती, इसलिए वह चाय नहीं बनाती है। मेरी इच्छा हुई कि मैं झट से जाकर सर के लिए चाय बनाकर ले आउँ। लेकिन सर के परिवारवाले किचन में मैं कैसे जाता?
माँ जी छोटी बहू को जाकर कहती हैं कि उन्होंने चाय बनाने के लिए कहा था।
‘‘ मैं उनके लिए चाय नहीं बनाउँगी।’’ छोटी बहू बोली।
‘‘ तुम्हारी तबियत खराब होने पर वे कितना चिंतित रहते हैं।’’
‘‘ सभी के पिता जी चिंतित रहते हैं।’’
‘‘ तुम चाय क्यों नहीं बनाई?’’
‘‘ मैं नहीं बनाउँगी। दीदी से कहिए।’’
‘‘ तम क्यों नहीं बनाओगी?’’
‘‘ वैसे ही। मैं नहीं बनाउँगी।’’
माँ जी बड़ी बहू से जाकर बोली कि बाबू जी के लिए एक कप चाय बना दो।

3

‘‘ नहीं बनाउँगी।’’ वह बोली।
‘‘ क्यों?’’
‘‘मेरी मर्जी। मेरा मन नहीं है। वे दिन भर बिना मतलब कप्म्यूटर चलाते रहते हैं। मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगता।’’
‘‘ वे तुम्हारे बच्चों के लिए कितना हैरान रहते हैं?’’
‘‘ यह उनका काम है।’’
सर ने चाय पीनी छोड़ दी है। स्वयं चाय बनाकर पीना उन्हें अच्छा नहीं लगता।
कभी-कभार कोई बनाकर रख देता है। वे सोचते हैं कि मेरी मर्जी। उनकी मर्जी जब होगी वे उन्हें चाय बनाकर देंगे। लेकिन सर अब चाय नहीं पीते।
मैं जब उनसे मिलने जाता हूँ तो चाय यूं ही राखी रहती है। बाद में वे बेसिन में डाल देते हैं।
अब सर काम करते समय अपने बगल में एक ग्लास पानी रखते हैं और काम करते रहते हैं। हमलोग
बातें करते रहते हैं और सर बीच-बीच में पानी का घूँट लिया करते हैं।

लेखक: जीतेन्द्र जीत
शिक्षा: एम ए
1971 से लेखन

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